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संसद का शीतकालीन सत्र 29 नवंबर से शुरू हो गया है. जब संसद में कोई भी सत्र चलता है तो जितनी गहमागहमी हाउस में अंदर होती है, उतनी ही गहमागहमी संसद परिसर की कैंटीन में भी होती है. जहां कई दिन पहले से इसकी तैयारियां शुरू हो जाती हैं. सुबह बड़ी तादाद में ताजी सब्जियां और जरूर सामग्री आती हैं. फिर नाश्ते और लंच की तैयारियां होने लगती हैं. हाल ही में संसद की कैंटीन में मिलने वाली सब्सिडी खत्म भी कर दी गई है.
जब संसद में सत्र शुरू होता है तो हाउस के साथ काफी हद तक बड़ी गहमागहमी संसद परिसर की कैंटींस में दिखती है. जहां नाश्ते से लेकर लंच और चाय के लिए सांसदों और उनके स्टाफ की भीड़ जुटने लगती है. संसद सत्र को कवर करने वाले पत्रकार भी इस कैंटीन का लाभ उठाते हैं. जानते हैं कैसी है संसद की कैंटीन और ये कैसे काम करती है.

वैसे संसद की कैंटीन कुछ महीने पहले भी चर्चाओं में थी. उसकी वजह थी सरकार द्वारा इसके खाने पर दी जाने वाली सब्सिडी को खत्म करने के लिए. पिछले कुछ सालों से संसद कैंटीन को लोग उसके बेहद सस्ते खाने के लिए याद किया करते थे. मीडिया में इसे लेकर अक्सर खबरें आती थईं लेकिन अब इसका खाना उतना सस्ता नहीं रह गया. अब वहां सभी खाने के आइटम्स की कीमतें बढ़ गईं हैं संसद की कैंटीन का अपना इतिहास है. ये आजादी के बाद से ही सांसदों और संसद परिसर कर्मचारियों के साथ यहां आने वाले तमाम तरह के प्रतिनिधिमंडल और मेहमानों की आगवानी अपने बढ़िया खाने से करती रही है. क्या आपको मालूम है कि संसद की कैंटीन कैसी है. यहां रोज खाने की तैयारी कैसे होती है.
जिस समय देश आजाद हुआ, तब संसद की कैंटीन काफी छोटी और परंपरागत थी. गैस के चूल्हे भी उसमें बाद में आए. पहले लोकसभा का स्टाफ ही कैंटीन चलाने के लिए मुकर्रर था. अगर पुराने सांसदों की मानें तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अक्सर इस कैंटीन में खाने के लिए आते थे. हालांकि बाद के सालों में धीरे धीरे कैंटीन की व्यवस्था बदलती चली गई.

60 के दशक में संसद की कैंटीन में आमूलचूल बदलाव हुआ. ईंधन के तौर पर एलपीजी का इस्तेमाल शुरू हुआ. कैंटीन को कहीं ज्यादा पेशेवर और बेहतर बनाने के उद्देश्य लोकसभा सचिवालय द्वारा खुद कैंटीन संचालित करने की व्यवस्था बंद करके भारतीय रेलवे को कैंटीन चलाने का जिम्मा सौंपा गया.
1968 से भारतीय रेलवे के उत्तरी जोन के आई आर सी टी सी ने कैंटीन का काम संभाल लिया. ये वो दौर था जब कैंटीन बहुत सस्ती थी और खान-पान के लिए तमाम आइटम वेजेटेरियन से लेकर नान वेज तक उपलब्ध रहते थे.संसद में एक मुख्य किचन है. यहां खाना बनकर तैयार होता है और संसद परिसर में बनाई गई पांच कैंटींस में उन्हें ले जाया जाता है. जहां खाना गर्म करने की पूरी व्यवस्था है. संसद की कैंटीन में भोजन की प्रक्रिया सुबह से ही शुरू हो जाती है. सुबह से पर्याप्त मात्रा में सब्जियां, दूध, मीट और अन्य जरूरी सामान कैंटीन में पहुंच जाते हैं. कैंटीन स्टाफ अपना काम शुरू कर देता है. कैंटीन में कंप्युटर प्रिंटर से लेकर फर्नीचर और चूल्हे से लेकर खाने और परोसने से जुड़ा हर सामान लोकसभा सचिवालय द्वारा उपलब्ध कराया जाता है.

वर्ष 2008 के आसपास कई बार पाइप लाइंस में गैस लीक और उपकरणों में आ रही गड़बड़ी के चलते कैंटीन में ईंधन का पूरा सिस्टम ही बदल दिया गया. अब यहां खाना पूरी तरह बिजली के उपकरणों पर ही पकता और बनता है. कैंटीन की व्यवस्थाओं और क्वालिटी को देखने का काम सांसदों से जुड़ी एक समिति करती है. वो बीच बीच में इसके लिए दिशा निर्देश भी तय करती है. जब तक आईआरसीटीसी संसद की कैंटीन को चला रही थी, तब तक वो इसके लिए करीब 400 लोगों का स्टाफ रखती थी.
जब संसद का सत्र चल रहा होता है तो कैंटीन में करीब 5000 लोगों का खाना पकता है. खाने को आमतौर पर 11 बजे तक तैयार कर दिया जाता है. फिर इसे मुख्य कैटीन से परिसर की दूसरी कैंटीन में ले जाया जाता है. पिछले साल तक कैंटीन में कुल 90 तरह के खानपान के आइटम उपलब्ध रहते थे. जिसमें ब्रेकफास्ट, लंच और शाम का नाश्ता होता है. लेकिन अब कैंटीन को भारतीय पर्यटन विकास निगम यानि आईटीडीसी द्वारा 27 जनवरी से संचालित किया जा रहा है. अब इसमें खाने की आइटमों की संख्या घटाकर 48 कर दी गई है. लेकिन ये ध्यान रखा जाएगा कि ये सभी आइटम बेहतर क्वालिटी और स्वाद वाले हों.
कैंटीन के जरूरी खाद्य सामग्री अनाज, दलहन, तेल, घी, मसाले आदि की खरीदी केंद्रीय भंडार से की जाती है तो रोज सब्जी, फल संसद परिसर के करीब स्थित मदर डेयरी से आते हैं. मीट के लिए कैंटीन का तय वेंडर होता है. वहीं दूध दिल्ली दूध स्कीम के जरिए रोज वहां आता है. बाहर से आने वाली खाद्य सामानों की संसद परिसर के गेट पर कड़ी चेकिंग होती है. उसे एक्सरे मशीनों की जांच से निकलना होता है. कैंटीन में परोसी जाने वाली मिठाइयां पहले बाहर से टेंडर करके मंगाई जाती थीं.

संसद की कैंटीन में सत्र के दौरान काफी गहमागहमी और लंबी लाइन देखने को मिल जाती है लेकिन आम दिनों में यहां भीड़ कम हो जाती है. आमतौर पर अब यहां सरकारों के मंत्री भी कैंटीन में कम नजर आते हैं. पुराने सांसद बताते हैं कि 80 के दशक तक यहां कैंटीन में मंत्री ही प्रधानमंत्री भी अक्सर नजर आ जाते थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी वर्ष 2014 में कैंटीन में खाना खाने गए. उससे पहले नेहरू के बारे में कहा जाता है कि वो यहां आया करते थे. इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री नहीं थीं तो यहां नजर आ जाती थीं तो पीवी नरसिंहराव प्रधानमंत्री बनने से पहले सांसद और मंत्री रहने तक यहां नियमित दिख जाते थे.

संसद की कैंटीन में खानपान का जिम्मा अब आईटीडीसी के एक्सपर्ट शेफ ने संभाल लिया है. ये अशोक होटल ग्रुप्स से जुड़े रहे हैं. आईटीडीसी दिल्ली में कनॉट प्लेस के करीब वेस्टर्न कोर्ट की कैंटीन का जिम्मा भी संभालती है. जब आईआरसीटीसी की जगह संसद की समिति कैंटीन के लिए नया कांट्रैक्टर ढूंढ रही थी तब आईटीडीसी के साथ हल्दीराम और बीकानेरवाला भी लाइन में थे. लेकिन समिति ने आईटीडीसी पर मुहर लगाई.
