आपने बड़ी-बड़ी नदियों के ऊपर बने ब्रिज देखे होंगे.क्या आपने कभी सोचा है कि गहरे पानी में ब्रिज की नींव कैसे पड़ती है?

VS CHAUHAN FOR NEWS EXPRESS INDIA

आजकल हाईवे और रेल पुलों का जमाना है. देशभर में नदियों पर ब्रिज बन रहे हैं, जो यात्रा को आसान बनाते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन ब्रिजों की नींव गहरे पानी में कैसे डाली जाती है? जमीन पर तो खुदाई करके पिलर्स गाड़ देते हैं लेकिन नदी के तेज बहाव और गहराई में ये काम जानलेवा हो जाता है. मजदूरों का कलेजा मुंह में आ जाता है क्योंकि एक गलती और सब कुछ बह सकता है.

नदियों पर ब्रिज बनाए की मुख्य तकनीक है ‘कॉफर्डैम’ (Cofferdam), जो अस्थायी जलरोधी संरचना है. ये पानी को रोककर सूखा क्षेत्र बनाती है, जहां नींव डाली जा सकती है. इसके लिए सबसे पहले सर्वे होता है. नदी की गहराई, मिट्टी की मजबूती, बहाव की रफ्तार मापी जाती है. फिर डिजाइन तैयार होता है—कितने पिलर्स, कितनी गहराई होगी. कॉफर्डैम के लिए स्टील की पतली-मोटी शीट्स (Sheet Piles) इस्तेमाल होती है. ये 10-20 मीटर लंबी होती हैं, जिन्हें हाइड्रोलिक हथौड़ों या वाइब्रेटर से नदी तल में ठोक दिया जाता है.

बनाते हैं एक दीवार
इन्हें एक-दूसरे में इंटरलॉक करके गोलाकार या चौकोर दीवार बना देते हैं. ये दीवार पानी को अंदर आने से रोकती है. भारत में बॉम्बे हाई कोर्ट के पास ठाणे क्रीक ब्रिज पर यही तरीका अपनाया गया था. इंजीनियर बताते हैं कि शीट पाइल्स को ठोकते वक्त वाइब्रेशन से मछलियां भाग जाती हैं, लेकिन मजदूरों को हेलमेट और लाइफ जैकेट पहननी पड़ती है. दीवार तैयार होने के बाद असली खेल शुरू होता है. अंदर बड़े-बड़े पंप लगाकर पानी को बाहर निकाला जाता है. ये पंप घंटों चलते हैं और पानी को नदी में ही वापस डाल दिया जाता है

ताकि पर्यावरण को नुकसान ना हो. जब एरिया सूख जाता है तब मजदूर अंदर उतरते हैं—कभी सीढ़ियों से तो कभी क्रेन से.

 दिन रात काम 
अंदर रेत, कीचड़ और पत्थर हटाए जाते हैं. अगर मिट्टी कमजोर हो तो ‘पाइल फाउंडेशन’ का सहारा लेते हैं—लोहे की लंबी पाइप् को हथौड़े से नदी तल में 20-50 मीटर गहराई तक गाड़ दिया जाता है. फिर इनके ऊपर कंक्रीट का ढांचा बनता है. कंक्रीट डालते वक्त वाइब्रेटर से हवा के बुलबुले निकाले जाते हैं, ताकि मजबूत बने. लेकिन ये आसान नहीं है. इसमें काफी खतरा है. अगर दीवार में लीक हो जाए या भूकंप आए तो सब ढह सकता है. इसलिए सेंसर लगे रहते हैं,

जो पानी के लेवल की निगरानी करते हैं. गहरे पानी के लिए कॉफर्डैम से आगे ‘कैसन’ (Caisson) तकनीक अपनाई जाती है. ये जलरोधी बॉक्स होते हैं, जो नदी तल पर उतरते जाते हैं. ये दो तरह के होते हैं- ओपन कैसन और पन्यूमेटिक कैसन. ओपन कैसन में नीचे खुला होता है, जो खुद-ब-खुद डूबता है. मजदूर अंदर जाकर खुदाई करते हैं. लेकिन पन्यूमेटिक कैसन में हवा का प्रेशर बनाकर पानी रोका जाता है. मजदूर एयरलॉक से गुजरकर ‘एयर चैंबर’ में उतरते हैं, जहां हवा का दबाव समुद्र की गहराई जितना होता है.

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